कमिश्नर सविता प्रधान के राज में नगर निगम सिंगरौली ‘कमीशन कॉरिडोर’? विकास गायब, सौदेबाजी हावी!

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By: नई ताक़त ।। डिजिटल टीम

On: Monday, March 30, 2026 7:26 AM

कमिश्नर सविता प्रधान के राज में नगर निगम सिंगरौली ‘कमीशन कॉरिडोर’? विकास गायब, सौदेबाजी हावी!

फाइलों की रफ्तार ‘प्रतिशत’ पर निर्भर! बिना कमीशन नहीं चलती कलम—निगम में खुला खेल?

अंदरूनी कलह, बाहर ठप विकास—क्या सविता प्रधान की चुप्पी ही सबसे बड़ा सवाल?

नई ताकत ब्यूरो सिंगरौली
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सिंगरौली,नगर निगम सिंगरौली इन दिनों सवालों के ऐसे भंवर में फंसा हुआ है, जहां हर दिशा में सिर्फ आरोप, अव्यवस्था और कथित भ्रष्टाचार की गूंज सुनाई दे रही है। शहर के विकास का जिम्मा संभालने वाली यह संस्था अब खुद ही संदेह के घेरे में है। और इन सबके केंद्र में हैं—नगर निगम कमिश्नर सविता प्रधान।
जब सविता प्रधान ने पदभार संभाला था, तब उम्मीदों का एक बड़ा पहाड़ खड़ा किया गया था। कहा गया था कि निगम में पारदर्शिता आएगी, भ्रष्टाचार पर लगाम लगेगी और विकास कार्यों में तेजी देखने को मिलेगी। लेकिन मौजूदा हालात इन दावों के ठीक उलट नजर आ रहे हैं। अब निगम के गलियारों में विकास की नहीं, बल्कि “कमीशन”, “सेटिंग” और “प्रभाव” की चर्चा ज्यादा हो रही है।

 

निगम बना ‘कमीशन कॉरिडोर’?

सूत्रों की मानें तो नगर निगम के कई विभागों—खासतौर पर स्टोर, स्वास्थ्य और इलेक्ट्रिकल शाखा—में कथित तौर पर कमीशनखोरी का खेल चरम पर है। सबसे ज्यादा सवाल इलेक्ट्रिकल विभाग को लेकर उठ रहे हैं, जहां 10 से 15 प्रतिशत तक “कट” तय होने की बात कही जा रही है।
आरोप इतने गंभीर हैं कि कहा जा रहा है—
बिना “प्रतिशत” तय हुए कोई फाइल आगे नहीं बढ़ती।
भुगतान से पहले “सेटिंग” अनिवार्य हो चुकी है।
और यह सब बिना ऊपरी स्तर की जानकारी के संभव ही नहीं।
अगर ये आरोप सही हैं, तो यह सिर्फ विभागीय गड़बड़ी नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की साख पर सीधा हमला है।

 

फाइलों में ‘स्पीड ब्रेकर’, या जानबूझकर जाम?

नगर निगम में काम कराने पहुंचे ठेकेदारों और आम नागरिकों की शिकायत है कि फाइलें महीनों तक अटकी रहती हैं। लेकिन जैसे ही “सही संकेत” मिलता है, वही फाइलें कुछ ही घंटों में मंजूर हो जाती हैं।
यह स्थिति साफ संकेत देती है कि काम की गति अब नियमों से नहीं, बल्कि “लेन-देन” से तय हो रही है।
ऐसे में सवाल उठता है—क्या यह प्रशासनिक विफलता है या सुनियोजित तंत्र?

 

कमिश्नर की भूमिका पर सवाल
सबसे बड़ा और सीधा सवाल कमिश्नर सविता प्रधान की भूमिका को लेकर उठ रहा है।
क्या उन्हें इन सब गतिविधियों की जानकारी नहीं है?

 

या फिर जानकारी होने के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं की जा रही?
दोनों ही स्थितियां चिंताजनक हैं।
अगर जानकारी नहीं है, तो यह नेतृत्व की कमजोरी है।
अगर जानकारी है और फिर भी चुप्पी है, तो यह और भी गंभीर मामला बन जाता है।
निगम के अंदर ही कुछ कर्मचारी अब खुलकर यह कहने लगे हैं कि “ऊपर से सख्ती नहीं है, इसलिए नीचे मनमानी चल रही है।”
अंदरूनी राजनीति ने बिगाड़ा सिस्टम

 

नगर निगम के भीतर इन दिनों एक और बड़ी समस्या सामने आ रही है—अंदरूनी खींचतान। अधिकारी एक-दूसरे के खिलाफ शिकायतें लेकर घूम रहे हैं। आपसी तालमेल की जगह अविश्वास ने ले ली है।
इसका सीधा असर कामकाज पर पड़ रहा है।
जहां प्रशासन को मिलकर शहर के विकास पर काम करना चाहिए था, वहां अब ऊर्जा आपसी टकराव और आरोप-प्रत्यारोप में खर्च हो रही है।

 

 

विकास कार्य क्यों ठप पड़े हैं?

शहर में कई महत्वपूर्ण विकास कार्य अधूरे पड़े हैं या उनकी रफ्तार बेहद धीमी है। सड़कों की हालत, सफाई व्यवस्था और बिजली से जुड़े कामों को लेकर लगातार शिकायतें सामने आ रही हैं।

स्थानीय लोगों का कहना है कि—
“निगम में अब विकास नहीं, सिर्फ फाइलों का खेल चल रहा है।”
जब प्राथमिकता विकास की जगह “कमीशन मैनेजमेंट” बन जाए, तो नतीजा यही होता है—ठप योजनाएं और नाराज जनता।

 

 

 

राजनीतिक दबाव या प्रशासनिक कमजोरी?

सूत्रों का यह भी दावा है कि निगम में कामकाज अब सिर्फ प्रशासनिक फैसलों से नहीं, बल्कि राजनीतिक दबावों के हिसाब से तय हो रहा है। नेताओं और मंत्रियों को खुश रखने की होड़ में वास्तविक प्राथमिकताएं पीछे छूटती जा रही हैं।
अगर यह सच है, तो यह स्थिति और भी गंभीर हो जाती है क्योंकि इससे न सिर्फ प्रशासनिक स्वतंत्रता प्रभावित होती है, बल्कि जनता का भरोसा भी कमजोर पड़ता है।
निगम के अंदर उठने लगी बगावत की आवाज
अब स्थिति यह हो चुकी है कि निगम के अंदर ही आवाजें उठने लगी हैं। कुछ कर्मचारी और अधिकारी खुले तौर पर यह कह रहे हैं कि मौजूदा व्यवस्था पहले से बदतर है।

 

 

 

यह संकेत है कि सिस्टम के भीतर भी असंतोष पनप रहा है—और अगर समय रहते इसे नहीं संभाला गया, तो यह बड़ा संकट बन सकता है।
आगे क्या? बड़ा खुलासा संभव
सूत्रों के मुताबिक, नगर निगम में चल रहे इस कथित “कमीशन नेटवर्क” का जल्द ही नामों और प्रतिशत के साथ खुलासा हो सकता है। अगर ऐसा होता है, तो यह मामला सिर्फ सिंगरौली तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे प्रदेश की राजनीति और प्रशासन में हलचल मचा सकता है।
जवाबदेही तय होगी या सवाल दबेंगे?
अब सबसे अहम सवाल यही है—
क्या इन आरोपों की निष्पक्ष जांच होगी?
क्या जिम्मेदारों पर कार्रवाई होगी?
या फिर यह मामला भी बाकी मामलों की तरह दबा दिया जाएगा?

 

 

सिंगरौली की जनता अब जवाब चाहती है।
उम्मीदें टूट चुकी हैं, लेकिन सवाल अभी भी जिंदा हैं।
अगर समय रहते स्थिति नहीं सुधरी, तो नगर निगम सिंगरौली का नाम विकास के लिए नहीं, बल्कि “कमीशन कॉरिडोर” के रूप में याद किया जाएगा।

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