39 साल पहले सिर्फ 9 करोड़ के बजट में रामानंद सागर ने रची थी कालजयी ‘रामायण’, बिना आधुनिक VFX के अगरबत्ती के धुएं और रुई के बादलों से पैदा किया था दिव्य और भव्य जादुई असर

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By: नई ताक़त ।। डिजिटल टीम

On: Saturday, April 4, 2026 9:46 AM

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39 साल पहले सिर्फ 9 करोड़ के बजट में रामानंद सागर ने रची थी कालजयी ‘रामायण’, बिना आधुनिक VFX के अगरबत्ती के धुएं और रुई के बादलों से पैदा किया था दिव्य और भव्य जादुई असर

आज के दौर (In today’s times) में जहां नितेश तिवारी की ‘रामायण’ जैसी फिल्में हज़ारों करोड़ रुपये के बजट पर बन रही हैं, वहीं 39 साल पहले रामानंद सागर ने सिर्फ़ 7 से 9 करोड़ रुपये में भारतीय टेलीविज़न का सबसे बड़ा इतिहास रच (Creating the greatest history in Indian television) दिया था। 1987 में प्रसारित होने वाले इस महान सीरियल (This magnificent serial currently being broadcast) की लागत लगभग 9 लाख रुपये प्रति एपिसोड (per episode) थी। उस समय मॉडर्न VFX (VFX) या हाई-टेक कंप्यूटर ग्राफिक्स मौजूद नहीं (High-tech computer graphics are not present.) थे, लेकिन मेकर्स ने अपनी अद्भुत क्रिएटिविटी से दर्शकों को मंत्रमुग्ध (The makers mesmerized the audience with their extraordinary creativity.) कर दिया था। धुंध और कोहरे के असर (The Impact of Fog ) के लिए अगरबत्ती के धुएं का इस्तेमाल (The Use of Incense Smoke) किया गया था, जबकि आसमान में तैरते बादलों (Clouds floating in the sky)  को दिखाने के लिए सिंपल रूई का सहारा (The Support of Simple Cotton) लिया गया था।

 

 

 

 

 

 

रामायण के सीन को भव्यता (The Grandeur of the Ramayana Scenes) देने के लिए उस दौर में ग्लास पेंटिंग (Glass Painting) और मिनिएचर मॉडल का बड़े पैमाने (The Large Scale of Miniature Models) पर इस्तेमाल किया गया था। स्वर्ग, बड़े-बड़े पहाड़ और ऊंचे-ऊंचे महल दिखाने के लिए छोटे-छोटे फ्रेमवर्क (Framework) बनाए गए और उन्हें कैमरा एंगल से इस तरह फिल्माया (They filmed him from a camera angle in such a way…) गया कि वे स्क्रीन पर असली और बड़े लगें। लड़ाई के सीन में तीरों की टक्कर और दुईजा शक्तियों (Dual Powers) को दिखाने के लिए ‘SEG 2000’ जैसी मशीनों का इस्तेमाल किया गया, जबकि नकली हाथ-पैर और सजावट के लिए प्लास्टर ऑफ पेरिस का सहारा (Turning to Plaster of Paris for Decoration) लिया गया। इन आसान टेक्निकल एक्सपेरिमेंट ने आस्था (A Simple Technical Experiment Restored Faith) और कला का ऐसा संगम पेश किया कि दर्शक भाव-विभोर (They presented such a fusion that the audience was left spellbound.) हो गए।

 

 

 

 

रामानंद सागर के काम ने न सिर्फ टेक्निकल सीमाओं को तोड़ा (Not only broke through technical limitations) , बल्कि अरुण गोविल को भगवान राम और दीपिका चिखलिया (Dipika Chikhlia) को माता सीता के रूप में घर-घर में पूजा जाने लगा। आज भी जब रामायण की बात होती है, तो सबसे पहले इन कलाकारों की छवि दिमाग में आती है। यह सीरीज साबित करती है कि किसी महाकाव्य को स्क्रीन (The Epic on Screen) पर लाने के लिए सिर्फ भारी-भरकम बजट काफी नहीं (A Massive Budget Is Not Enough) होता, बल्कि एक मजबूत स्क्रिप्ट, लगन और उससे भी ज्यादा ओरिजिनल सोच (More Original Thinking) की जरूरत होती है। इसीलिए इस ‘रामायण’ की लोकप्रियता दशकों बाद भी कम (Popularity Wanes Even After Decades) नहीं हुई है और यह भारतीय संस्कृति (Indian Culture) और डिजिटल एंटरटेनमेंट के इतिहास में एक सुनहरे दौर (A Golden Era in the History of Digital Entertainment) के तौर पर दर्ज है।

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