13 साल ‘नो प्लाट’ का झूठ, अब विधायक को कौड़ियों में करोड़ों की जमीन! कमिश्नर–राजस्व अफसरों पर मिलीभगत के गंभीर आरोप
SINGRAULI NEWS: नगर निगम की कार्यप्रणाली (Functioning of the Municipal Corporation) पर एक बार फिर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। 13 वर्षों तक आम जनता को यह कहकर गुमराह (Misguided) किया जाता रहा कि “नगर निगम के पास कोई खाली प्लाट उपलब्ध नहीं (No vacant plots available.) है”, लेकिन अब अचानक उसी निगम के पास से करोड़ों की जमीन निकल आती है—और वह भी सीधे विधायक के लिए, वह भी कौड़ियों के दाम (Dirt cheap) पर!
यह पूरा मामला केवल एक जमीन आवंटन का नहीं (Not a single land allotment) , बल्कि एक सुनियोजित “सिस्टमेटिक लूट” की ओर इशारा करता है। सवाल यह है कि जब 13 साल तक निगम के पास कोई प्लाट नहीं था, तो अचानक यह प्लाट कहां से आ गया? अगर जमीन पहले से उपलब्ध (Available) थी, तो आखिर इतने वर्षों तक उसे छुपाकर क्यों रखा गया? और अगर अब तैयार किया गया, तो किस प्रक्रिया (Process) के तहत?
13 साल का ‘नुकसान’ या सुनियोजित खेल?
इस पूरे घटनाक्रम से साफ संकेत मिलता है कि नगर निगम (Municipal council) ने न केवल जनता को भ्रमित किया, बल्कि इस दौरान करोड़ों रुपये के राजस्व का नुकसान (Loss of Revenue) भी किया। अगर यह प्लाट पहले से मौजूद था, तो इसे सार्वजनिक नीलामी (public auction) के जरिए बेचा जा सकता था, जिससे निगम को भारी राजस्व प्राप्त (Revenue Received) होता। लेकिन ऐसा नहीं किया गया।
अब जो जानकारी सामने आ रही है, उसके मुताबिक यह जमीन बेहद कम कीमत पर, बिना पारदर्शिता के, “चुपचाप” सौंप दी गई। यह सीधे-सीधे सरकारी संपत्ति को निजी लाभ (Directly converting government property into private gain) के लिए इस्तेमाल करने का मामला बनता दिख रहा है।
MIC की मंजूरी को किया नजरअंदाज
नगर निगम के नियमों (Municipal Corporation rules) के अनुसार, किसी भी खाली प्लाट (Vacant Plot) के आवंटन या बिक्री के लिए MIC (मेयर इन काउंसिल) की मंजूरी अनिवार्य होती है। लेकिन इस पूरे मामले में MIC को पूरी तरह दरकिनार कर दिया गया। न कोई प्रस्ताव सार्वजनिक (Public Proposal) हुआ, न कोई चर्चा—सीधे फैसला और जमीन ट्रांसफर!
इससे साफ है कि प्रक्रिया को जानबूझकर गोपनीय (The process was deliberately kept confidential.) रखा गया, ताकि सवाल न उठें और मामला दबा रहे।
कमिश्नर पर सीधे आरोप—कुर्सी बचाने के लिए नियमों की बलि?
सूत्रों की मानें तो इस पूरे खेल के केंद्र में खुद नगर निगम के कमिश्नर (Municipal Commissioner) हैं। आरोप है कि उन्होंने अपनी कुर्सी बचाने और “ऊपर” के दबाव को संतुष्ट करने के लिए सभी नियमों को ताक पर रख दिया। राजस्व अधिकारियों (Revenue Officers) के साथ मिलकर पूरी फाइल को इस तरह तैयार किया गया कि कागजों में सब कुछ “सही” दिखे, लेकिन असल में यह एक बड़ा घोटाला बन जाए।
अगर यह सच है, तो यह सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही (Administrative Negligence) नहीं, बल्कि एक सुनियोजित भ्रष्टाचार का मामला है, जिसमें उच्च स्तर की मिलीभगत से इंकार नहीं किया जा सकता।
जनता के साथ विश्वासघात
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या नगर निगम सिर्फ “खास लोगों” के लिए काम कर रहा है? आम जनता को सालों तक प्लाट नहीं मिलने का बहाना दिया जाता रहा, जबकि अंदरखाने जमीनें बचाकर रखी गईं और जरूरत पड़ने पर “चयनित लोगों” को सस्ते में दे दी गईं।
यह सीधे-सीधे जनता के साथ विश्वासघात है।
जांच की मांग तेज
अब इस पूरे मामले की निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच (High-level inquiry) की मांग तेज हो रही है। जरूरत है कि:
पिछले 13 वर्षों के सभी प्लाट रिकॉर्ड की जांच हो
संबंधित अधिकारियों की भूमिका तय की जाए
MIC की अनदेखी पर जवाबदेही तय हो
और सबसे अहम—इस जमीन सौदे को तत्काल निरस्त कर पारदर्शी प्रक्रिया अपनाई जाए
अगर इस मामले में समय रहते कार्रवाई नहीं हुई, तो यह एक खतरनाक परंपरा (A Dangerous Tradition) बन जाएगी, जहां सरकारी संपत्ति “गोपनीय सौदों” में बंटती रहेगी और जनता सिर्फ दर्शक बनी रहेगी।
अब सवाल सिर्फ एक प्लाट का नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की साख का है—और इसका जवाब देना प्रशासन (Administration, provide a response.) के लिए अब अनिवार्य हो गया है।







