न्यू इनकम टैक्स एक्ट 2025 के तहत टीडीएस नियमों में बड़ा बदलाव, बैंक एफडी पर अब एक लाख रुपये तक के ब्याज पर नहीं कटेगा टैक्स, वरिष्ठ नागरिकों और सामान्य जमाकर्ताओं को मिली बड़ी राहत कैसे मिलेगी?
इनकम टैक्स डिपार्टमेंट (Income Tax Department) ने नए इनकम टैक्स एक्ट (New Income Tax Act) , 2025 के लागू होने के बाद बैंक और पोस्ट ऑफिस डिपॉजिट (Post Office Deposit) पर मिलने वाले ब्याज (TDS) के नियमों को पूरी तरह साफ (Make the rules completely clear.) कर दिया है। नए नियमों के मुताबिक, सीनियर सिटिजन (Senior Citizen) को अब एक फाइनेंशियल ईयर (Financial Year) में 1 लाख रुपये तक की ब्याज इनकम (Interest Income) पर कोई TDS नहीं देना होगा। वहीं, आम नागरिकों (Ordinary citizens) के लिए यह लिमिट 50,000 रुपये तय की गई है। डिपार्टमेंट (Department) ने सोमवार को एक ऑफिशियल बयान जारी (Official Statement Issued) कर कहा कि अगर ब्याज इनकम इन तय लिमिट से कम है, तो बैंकिंग रेगुलेशन एक्ट (Banking Regulation Act) , 1949 के तहत आने वाले किसी भी बैंक या संस्था को सोर्स पर टैक्स (Tax at Source for Banks or Institutions) (TDS) काटने की जरूरत नहीं होगी।
इनकम टैक्स डिपार्टमेंट (Income Tax Department) ने नए कानून के तहत ‘बैंकिंग कंपनी’ की परिभाषा (Definition of ‘Banking Company’) को लेकर टेक्निकल कंफ्यूजन (Technical Confusion) को दूर करने के लिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म (Social media platform) X पर डिटेल में जानकारी शेयर की है। डिपार्टमेंट ने साफ़ किया है कि नए इनकम टैक्स एक्ट, 2025 के सेक्शन 402 के तहत, वे सभी इंस्टीट्यूशन जिन पर बैंकिंग रेगुलेशन एक्ट, 1949 लागू होता है, उन्हें बैंकिंग कंपनी माना (Deemed a Banking Company) जाएगा। पुराने 1961 एक्ट के सेक्शन 51 का सीधा ज़िक्र न होने से जो कन्फ्यूजन पैदा हुआ था, उसे दूर करते हुए, डिपार्टमेंट ने साफ़ किया कि सभी बड़े बैंक और फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशन (Financial Institution) अपने आप इस नए कानून (new laws) के तहत कवर माने जाएंगे, जिससे कम्प्लायंस का प्रोसेस आसान (Simplified Compliance Process) हो जाएगा।
सरकार के इस क्लैरिफिकेशन (This clarification by the government) से देश के लाखों डिपॉजिटर्स (Depositors) के बीच ट्रांसपेरेंसी पक्की होगी और उन्हें बेवजह टैक्स डिडक्शन की चिंता से राहत मिलेगी। यह कदम खासकर छोटे इन्वेस्टर्स के लिए फायदेमंद (Beneficial for Small Investors) है जो अपनी सेविंग्स पर मिलने वाले इंटरेस्ट पर निर्भर (Interest-dependent) रहते हैं। फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशन्स (Financial Institutions) के लिए भी, टैक्स डिडक्शन का प्रोसेस अब आसान हो जाएगा, जिससे फाइनेंशियल ईयर (Financial Year) के आखिर में होने वाले टेक्निकल डिस्प्यूट्स की गुंजाइश खत्म (Scope for Technical Disputes Eliminated) हो जाएगी। इस क्लैरिटी के बाद, डिपॉजिटर्स अब बिना किसी शक के अपने फिक्स्ड डिपॉजिट (FDs) और सेविंग्स स्कीम्स (Savings Schemes) में इन्वेस्टमेंट को मैनेज (Managing Investments) कर पाएंगे और उन्हें रिफंड के लिए लंबा इंतजार नहीं करना पड़ेगा।







