Singrauli Breaking News:  सिंगरौली की शिक्षा व्यवस्था भगवान भरोसे; डीईओ कविता त्रिपाठी के कार्यकाल में क्यों नहीं बदल रही स्कूलों की तस्वीर?

Follow Us

Advertisement

Singrauli Breaking News:  सिंगरौली की शिक्षा व्यवस्था भगवान भरोसे; डीईओ कविता त्रिपाठी के कार्यकाल में क्यों नहीं बदल रही स्कूलों की तस्वीर?

नई ताकत न्यूज़ सिंगरौली
_______________________

Singrauli Breaking News: सिंगरौली जिले के सरकारी स्कूलों की जमीनी हकीकत देखकर ऐसा (Seeing the ground reality of government schools in Singrauli district, this) लगता है कि शिक्षा विभाग के दावे और स्कूलों की वास्तविक स्थिति दो अलग-अलग दुनिया की कहानियां हैं (The situation is a tale of two different worlds.) । स्कूलों में शिक्षकों की भारी कमी, जर्जर भवन, बदहाल शौचालय, अधूरी सुविधाएं और कमजोर शैक्षणिक व्यवस्था के बीच सबसे बड़ा सवाल जिला शिक्षा अधिकारी (Amidst a weak educational system, the biggest question concerns the District Education Officer.) कविता त्रिपाठी की कार्यप्रणाली पर उठ रहा है।

 

जब कविता त्रिपाठी ने जिले की कमान संभाली थी, तब उम्मीद जताई जा रही थी कि शिक्षा व्यवस्था में सुधार (At that time, hopes were being expressed for improvements in the education system.) होगा, लेकिन आज भी जिले के कई विद्यालय बदहाली का शिकार हैं। बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने के बजाय विभाग का पूरा ध्यान आदेश, बैठकों और कागजी उपलब्धियों पर दिखाई (visible on paper achievements) देता है।

 

सबसे बड़ा विवाद तब खड़ा हुआ जब विद्यालयों में पत्रकारों के प्रवेश को लेकर आदेश जारी (When orders were issued regarding entry of journalists into schools) हुआ। सवाल यह है कि यदि स्कूलों में सब कुछ ठीक है तो फिर जमीनी हकीकत सामने (Ground reality revealed) आने से डर किस बात का है? क्या शिक्षा विभाग नहीं चाहता कि जनता स्कूलों की वास्तविक स्थिति (The actual condition of schools) देखे? क्या जर्जर भवन, शिक्षकों की कमी और अव्यवस्थाएं कैमरे में कैद न हों, इसलिए ऐसे आदेश जारी किए गए?

 

जिले के सैकड़ों बच्चों को आज भी विषय विशेषज्ञ शिक्षकों का इंतजार है। कई स्कूलों में एक शिक्षक कई कक्षाओं का भार उठा (In schools, one teacher takes charge of several classes) रहा है। कहीं विज्ञान शिक्षक नहीं, कहीं गणित शिक्षक नहीं, तो कहीं नियमित पढ़ाई (Regular studies in some places) ही नहीं हो पा रही। आखिर इन समस्याओं का समाधान कब होगा?

 

बरसात शुरू होते ही कई विद्यालयों की पोल खुल जाती (The true nature of many schools would have been exposed.) है। छतों से पानी टपकता है, दीवारों में दरारें हैं और बच्चों की सुरक्षा तक खतरे में पड़ (Even the safety of children is at risk) जाती है। लाखों-करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद स्कूलों की ऐसी हालत आखिर किसकी जिम्मेदारी (After all, whose responsibility is it, despite the schools being in such a state?) है?

 

अभिभावकों का आरोप है कि विभाग का फोकस शिक्षा सुधार पर कम (The department is less focused on education reform.) और दिखावटी कार्यक्रमों पर ज्यादा है। नेताओं से साइकिल, ड्रेस और किताबें बंटवाने के फोटो तो खूब जारी होते हैं, लेकिन बच्चों के सीखने के स्तर (But the learning levels of children) , परीक्षा परिणाम और विद्यालयों की बदहाली पर चर्चा नहीं होती।

 

जनता अब जिला शिक्षा अधिकारी कविता त्रिपाठी से सीधे जवाब चाहती है—

  • जिले में शिक्षकों के कितने पद खाली हैं?
  • जर्जर विद्यालयों की सूची और मरम्मत की कार्ययोजना क्या है?
  • शिक्षा मद में खर्च हुए बजट का वास्तविक लाभ कहां दिख रहा है?
  • स्कूलों की स्थिति पर सवाल उठाने वालों को रोकने की कोशिश क्यों की गई?
  • बच्चों की शिक्षा से ज्यादा महत्वपूर्ण विभाग की छवि कैसे हो सकती है?

 

सिंगरौली के अभिभावकों (Parents in Singrauli) का कहना है कि उन्हें भाषण नहीं, परिणाम चाहिए। शिक्षा विभाग को यह समझना (The Education Department needs to understand this.) होगा कि स्कूल सरकारी हो सकते हैं, लेकिन उनमें पढ़ने वाले बच्चे (The children studying in them) जनता के हैं। यदि व्यवस्था में सुधार नहीं हुआ तो आने वाले समय में शिक्षा विभाग की जवाबदेही (Responsibility of the education department in time) को लेकर और बड़े सवाल खड़े होंगे।

#

Related News

July 22, 2026

July 22, 2026

July 22, 2026

July 22, 2026

July 22, 2026

July 22, 2026

Leave a Comment