सिंगरौली में नाबालिग बच्चे भीख और कबाड़ बीनने को मजबूर, बाल संरक्षण तंत्र पर उठे सवाल
सड़कों और बाजारों में नजर आ रहे बच्चे, शिक्षा, सुरक्षा और पुनर्वास को लेकर जिम्मेदार संस्थाओं से जवाब की मांग
नई ताकत न्यूज नेटवर्क टीम
सिंगरौली। जिले में बड़ी संख्या में नाबालिग बच्चे सड़कों, बाजारों और सार्वजनिक स्थानों पर भीख मांगते तथा कबाड़ बीनते नजर आ रहे हैं। नगर निगम क्षेत्र में भी ऐसे बच्चों की मौजूदगी देखे जाने की बात सामने आ रही है। इसके बाद जिले के बाल संरक्षण तंत्र (Child Protection System) की सक्रियता को लेकर सवाल उठने लगे हैं।
भीख मांगने और कबाड़ बीनने वाले कई बच्चों की उम्र स्कूल जाने की है। गरीबी, पारिवारिक परिस्थितियों अथवा अन्य कारणों के चलते यदि बच्चे शिक्षा से दूर रहकर सड़कों पर समय बिताने को मजबूर हैं, तो उनकी शिक्षा, सुरक्षा, स्वास्थ्य और पुनर्वास (Rehabilitation) की स्थिति पर गंभीरता से ध्यान देने की जरूरत है।
बच्चों की पहचान और पुनर्वास को लेकर सवाल
सबसे बड़ा सवाल बाल कल्याण समिति (Child Welfare Committee) और संबंधित बाल संरक्षण संस्थाओं (Child Protection Institutions) की सक्रियता को लेकर है।
क्या ऐसे बच्चों की पहचान के लिए नियमित सर्वे किया गया है? कितने बच्चों को स्कूल से जोड़ा गया? कितने बच्चों को सरकारी योजनाओं का लाभ मिला? कितने बच्चों का पुनर्वास कराया गया? और कितने मामलों में उनके परिवारों की आर्थिक एवं सामाजिक स्थिति का आकलन किया गया?
इन सवालों का जवाब संबंधित विभागों के आधिकारिक रिकॉर्ड से ही स्पष्ट हो सकता है।
बच्चों की पहचान नहीं, उनके अधिकार जरूरी
बच्चों की सामाजिक, जातीय या धार्मिक पहचान को लेकर अटकलें लगाने के बजाय प्राथमिकता यह होनी चाहिए कि प्रत्येक बच्चे को शिक्षा, भोजन, सुरक्षा और सम्मान मिल रहा है या नहीं।
यदि कोई बच्चा लगातार सड़क पर भीख मांगता या कबाड़ बीनता दिखाई देता है, तो उसकी परिस्थिति की जांच कर यह पता लगाना जरूरी है कि वह स्कूल से बाहर क्यों है और परिवार की स्थिति क्या है।
योजनाओं के बावजूद सड़क पर क्यों?
सरकार की ओर से बच्चों की शिक्षा, सुरक्षा और कमजोर परिवारों के लिए विभिन्न योजनाएं संचालित की जाती हैं। ऐसे में यदि बच्चे लगातार सड़कों पर दिखाई दे रहे हैं तो योजनाओं के जमीनी क्रियान्वयन (Ground-level Implementation) की समीक्षा भी जरूरी है।
प्रशासन को नगर निगम क्षेत्र सहित जिलेभर में विशेष अभियान चलाकर ऐसे बच्चों की पहचान करनी चाहिए। इसके बाद उनके परिवारों की स्थिति का सत्यापन, स्कूल में नामांकन, आवश्यक सरकारी योजनाओं से जोड़ने तथा जरूरत पड़ने पर बाल संरक्षण एवं पुनर्वास व्यवस्था (Child Protection and Rehabilitation System) उपलब्ध कराने की दिशा में कार्रवाई की जा सकती है।
प्रशासन से ठोस अभियान की मांग
सड़कों पर दिखाई देने वाले बच्चों को केवल हटाना समाधान नहीं है। उनके पीछे की पारिवारिक और आर्थिक परिस्थितियों को समझकर स्थायी समाधान की जरूरत है।
बच्चों का बचपन सड़क पर नहीं, स्कूल और सुरक्षित वातावरण में होना चाहिए। अब सवाल यह है कि जिले का बाल संरक्षण तंत्र ऐसे बच्चों की पहचान, शिक्षा और पुनर्वास के लिए क्या ठोस कदम उठाता है और उसकी जानकारी सार्वजनिक कब की जाती है?







