Singrauli breaking news: सिंगरौली शहर में ‘भीख’ का बढ़ता कारोबार, चौराहों पर फैले हाथ, दफ्तरों पर उठते सवाल… आखिर सिस्टम सो रहा है या समझौते में है?

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Singrauli breaking news: सिंगरौली शहर में ‘भीख’ का बढ़ता कारोबार, चौराहों पर फैले हाथ, दफ्तरों पर उठते सवाल… आखिर सिस्टम सो रहा है या समझौते में है?

नई ताकत न्यूज़ नेटवर्क सिंगरौली
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अवनीश तिवारी

Singrauli breaking news: शहर बदल रहा है, सड़कें चौड़ी हो रही हैं, योजनाओं (plans) के दावे हो रहे हैं, लेकिन सिंगरौली के कई चौराहों (Many intersections of Singrauli) , बाजारों और भीड़भाड़ वाले इलाकों की तस्वीर एक अलग कहानी कह (The picture of crowded areas tells a different story.)  रही है। लालबत्ती पर रुकिए… कुछ सेकंड में आपकी गाड़ी के पास कई हाथ पहुंच जाएंगे। कहीं कटोरा, कहीं मासूम चेहरा, कहीं मजबूरी का हवाला। सवाल सिर्फ इतना नहीं कि शहर में भीख मांगने (The question is not just whether people go to the city to beg.)  वालों की संख्या क्यों बढ़ रही है, सवाल यह भी है कि आखिर इस समस्या को रोकने की जिम्मेदारी (After all, the responsibility to stop this problem)  किसकी है?

स्थानीय लोगों के बीच चर्चा है कि नगर निगम क्षेत्र में भीख मांगने वालों की मौजूदगी (There is talk among the local people about the presence of beggars in the municipal area.) लगातार दिखाई दे रही है, लेकिन रोकथाम और पुनर्वास को लेकर कोई बड़ा, स्थायी (No major, permanent rehabilitation measures) और दिखने वाला अभियान जमीन पर नजर नहीं आता।

शहर में यह भी तीखी बहस सुनाई (A heated debate was also heard in the city.) देती है कि जब सरकारी व्यवस्था पर ही कथित (alleged on the government system) “कमीशन संस्कृति” के आरोप लगते हों, तब सामाजिक अव्यवस्थाओं पर नियंत्रण की नैतिक ताकत कितनी बचती (How much moral power remains to control social disorder?)  है। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन जनता के बीच व्यवस्था को लेकर बढ़ता अविश्वास साफ महसूस (The growing distrust among the public towards the system is clearly felt.) किया जा सकता है।

सुबह का समय हो या शाम की भीड़—बस स्टैंड, बाजार, धार्मिक स्थलों (religious places)  और प्रमुख मार्गों पर भीख मांगते लोग अब असामान्य दृश्य नहीं रह (People begging on major roads are no longer an unusual sight.) गए हैं। लोगों का सवाल है—क्या प्रशासन को यह सब दिखाई नहीं देता? या फिर कार्रवाई सिर्फ बैठकों और फाइलों तक सीमित रह गई है?

मध्यप्रदेश में भीख को लेकर कानून और प्रशासनिक कार्रवाई की बहस नई नहीं है। राज्य में भिक्षावृत्ति रोकने से जुड़े कानून मौजूद (There are laws in the state related to preventing begging.) रहे हैं और कई जिलों में भीख मांगने तथा भीख देने पर प्रशासनिक सख्ती की पहल भी की (Administrative crackdown on begging and giving of alms was also initiated.)  गई है। लेकिन सिंगरौली जैसे बढ़ते शहरी क्षेत्र में सवाल यह है कि क्या रोकथाम, सर्वे, पुनर्वास और निगरानी जैसी व्यवस्थाएं प्रभावी रूप (Effective monitoring systems)  से लागू हो रही हैं?

विशेषज्ञ मानते हैं कि भीखगिरी केवल कानून-व्यवस्था का मुद्दा (Begging is only a law and order issue)  नहीं, बल्कि गरीबी, विस्थापन, बेरोजगारी, नशे, मानव तस्करी और शहरी असमानता से जुड़ा जटिल सामाजिक प्रश्न (The complex social question of urban inequality) भी है। कई शहरों में संगठित भिक्षावृत्ति नेटवर्क की चर्चाएं (Discussions of organized begging networks in cities) भी सामने आती रही हैं। ऐसे में यदि किसी शहर में चौराहों पर भीख मांगने वालों की संख्या बढ़ती दिखाई ) दे (In some city, the number of people begging at the intersections was seen increasing., तो केवल हटाने की कार्रवाई से समस्या खत्म नहीं होती।

सवाल नगर निगम की भूमिका पर भी उठते हैं। नगर निगम का दायित्व केवल नाली-सड़क-सफाई तक सीमित नहीं माना (The responsibility of the Municipal Corporation is not limited to cleaning of drains and roads only.) जाता, बल्कि शहरी प्रबंधन, सार्वजनिक व्यवस्था (public order) और मानवीय पुनर्वास से जुड़े समन्वय में भी उसकी भूमिका (Its role in coordinating humanitarian rehabilitation) होती है। सिंगरौली नगर निगम के अधिकार क्षेत्र में शहरी सेवाओं (Urban services under the jurisdiction of Singrauli Municipal Corporation) और सार्वजनिक व्यवस्था से जुड़े कई काम (Many works related to public order) आते हैं।

लेकिन शहर पूछ रहा है—यदि समस्या इतनी दिखाई देने वाली है तो फिर नियमित अभियान क्यों नहीं दिखते (Then why are regular campaigns not visible?) ? क्या कभी यह सर्वे हुआ कि शहर में सक्रिय रूप से भीख मांगने वाले लोग कितने (How many people are actively begging in the city?) हैं? इनमें कितने बच्चे हैं? कितने बुजुर्ग हैं? कितने लोग बाहरी हैं? कितने लोग मजबूरी में हैं और कितने कथित नेटवर्क का हिस्सा (Part of how many alleged networks) ?

ये सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण (This question is also important) हैं क्योंकि कई जगहों पर ट्रैफिक सिग्नल (traffic signal) और व्यस्त मार्गों पर भीख मांगने को सुरक्षा जोखिम से भी जोड़ा (Begging on the streets is also linked to security risks.) गया है। अचानक वाहनों के बीच पहुंचना दुर्घटना का कारण बन सकता है। कई प्रशासनिक आदेशों में इस पहलू का उल्लेख किया गया है।

शहर में चर्चा का एक और पक्ष है—“सिस्टम की संवेदनहीनता”। कुछ लोग पूछते हैं, अगर कोई सचमुच भूखा है तो उसके लिए आश्रय, भोजन, पुनर्वास, कौशल प्रशिक्षण या सहायता व्यवस्था कहां है? क्या नगर निगम, समाज कल्याण विभाग, प्रशासन और स्वयंसेवी संस्थाओं के बीच कोई समन्वित मॉडल है? अगर है तो उसका असर सड़कों पर क्यों नहीं दिखता?

कई नागरिकों का मानना है कि समस्या दोहरी है—एक तरफ सार्वजनिक स्थलों पर बढ़ती भीखगिरी (Increasing begging in public places) , दूसरी तरफ व्यवस्था पर भरोसे का संकट। यही कारण है कि लोगों की बातचीत में अब प्रशासनिक निष्क्रियता (Administrative inaction in the talks now) , कथित भ्रष्टाचार और जवाबदेही की कमी जैसे शब्द भी सुनाई देने लगे हैं।

हालांकि, किसी भी संस्था या अधिकारी पर लगे आरोपों की निष्पक्ष जांच (Impartial investigation of the allegations against the officer) और प्रमाण जरूरी हैं। लेकिन यह भी सच है कि सवालों से भागने से समस्या खत्म नहीं (The truth is that running away from questions does not solve the problem.) होती। यदि जनता के बीच असंतोष है तो उसका जवाब पारदर्शिता और कार्रवाई से ही दिया जा सकता है।

जरूरत क्या है?
सिर्फ पकड़ो-छोड़ो अभियान नहीं।
सिर्फ फोटो खिंचवाने वाली कार्रवाई नहीं।
जरूरत है—शहरव्यापी सर्वे, पहचान, पुनर्वास, बाल संरक्षण, नशामुक्ति सहायता, आश्रय व्यवस्था, ट्रैफिक जोन मॉनिटरिंग और संयुक्त प्रशासनिक अभियान की।

अब सिंगरौली शहर कुछ सीधे सवाल पूछ रहा है—
◆ क्या शहर में भीख मांगने वालों की वास्तविक संख्या का कोई सरकारी रिकॉर्ड है?
◆ क्या नगर निगम और जिला प्रशासन ने संयुक्त कार्रवाई की योजना बनाई है?
◆ क्या पुनर्वास मॉडल पर गंभीरता से काम हो रहा है या सिर्फ नियमों की चर्चा हो रही है?
◆ क्या चौराहों पर दिखती यह तस्वीर प्रशासनिक विफलता का संकेत है?
◆ और सबसे बड़ा सवाल—व्यवस्था जनता का भरोसा कैसे वापस जीतेगी?

क्योंकि सिंगरौली का सवाल सिर्फ “भीख” का नहीं है। सवाल शहर की व्यवस्था, जवाबदेही और उस विकास मॉडल का है, जहां दावे बड़े हैं लेकिन चौराहों पर फैले हाथ अब भी दिखाई दे रहे हैं।

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