सिंगरौली: दो दिन में ध्वस्त नाली निर्माण! माजन खुर्द में गुणवत्ता की खुली पोल ,नगर निगम के निर्माण कार्यों पर उठे गंभीर सवाल, फोटो देखकर बिल पास करने के आरोप

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दो दिन में ध्वस्त नाली निर्माण! माजन खुर्द में गुणवत्ता की खुली पोल

नगर निगम के निर्माण कार्यों पर उठे गंभीर सवाल, फोटो देखकर बिल पास करने के आरोप

नई ताकत न्यूज़ नेटवर्क | सिंगरौली

सिंगरौली। नगर निगम क्षेत्र में विकास कार्यों की गुणवत्ता को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। माजन खुर्द स्कूल वाली गली में निर्माणाधीन नाली की हालत ने कथित तौर पर नगर निगम की निर्माण व्यवस्था और निगरानी तंत्र की पोल खोल दी है। स्थानीय स्तर पर आरोप है कि नाली निर्माण में घटिया सामग्री का इस्तेमाल किया गया, जिसके चलते निर्माण कार्य महज दो दिन भी टिक नहीं पाया।

जिस नाली का निर्माण आम जनता की सुविधा और जल निकासी के लिए किया जा रहा था, यदि वह निर्माण पूरा होने के कुछ ही समय बाद टूटने लगे तो सवाल केवल ठेकेदार पर नहीं, बल्कि उस पूरे सिस्टम पर खड़ा होता है जो निर्माण की गुणवत्ता की निगरानी और भुगतान की जिम्मेदारी संभालता है।

आखिर निर्माण की गुणवत्ता कौन देख रहा है?

नगर निगम क्षेत्र के अलग-अलग वार्डों में नाली, सड़क और अन्य निर्माण कार्य लगातार कराए जा रहे हैं। लेकिन सवाल यह है कि इन कार्यों की वास्तविक गुणवत्ता की जांच आखिर कितनी गंभीरता से होती है?

स्थानीय लोगों का आरोप है कि कई जगह निर्माण कार्य पूरा होने के बाद उसकी गुणवत्ता पर सवाल उठते हैं, लेकिन संबंधित अधिकारियों द्वारा मौके पर जाकर निर्माण सामग्री, मोटाई, सीमेंट की मात्रा, बेस और निर्माण की तकनीकी गुणवत्ता की जांच किए जाने को लेकर पारदर्शिता नहीं दिखाई देती।

माजन खुर्द स्कूल वाली गली का मामला भी इसी व्यवस्था पर सवाल खड़ा कर रहा है। यदि निर्माण वास्तव में मानकों के अनुरूप हुआ था, तो महज दो दिन में उसकी स्थिति खराब होने की वजह क्या है?

फोटो से पास हो रहे बिल या मौके पर हो रही जांच?

नगर निगम की कार्यप्रणाली को लेकर सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या निर्माण कार्यों की गुणवत्ता की वास्तविक जांच मौके पर जाकर की जाती है या फिर कागजी प्रक्रिया और फोटो के आधार पर ही काम को सही मान लिया जाता है?

यदि कोई अधिकारी बिना साइट विजिट किए केवल फोटो और दस्तावेजों के आधार पर निर्माण कार्य का भुगतान स्वीकृत करता है, तो यह व्यवस्था भविष्य में घटिया निर्माण को बढ़ावा देने वाली साबित हो सकती है।

हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि होना बाकी है। नगर निगम को स्पष्ट करना चाहिए कि माजन खुर्द में उक्त नाली निर्माण का वर्क ऑर्डर किस ठेकेदार को दिया गया, स्वीकृत राशि कितनी है, तकनीकी स्वीकृति क्या है, निर्माण की निर्धारित गुणवत्ता क्या है और भुगतान से पहले संबंधित अधिकारियों ने कितनी बार साइट विजिट की।

कमीशनखोरी के आरोपों की भी हो निष्पक्ष जांच

नगर निगम के निर्माण कार्यों में कमीशनखोरी के आरोप भी समय-समय पर सामने आते रहे हैं। स्थानीय स्तर पर कुछ लोग अधिकारियों और ठेकेदारों के बीच कथित कमीशन व्यवस्था के आरोप लगा रहे हैं।

ऐसे गंभीर आरोपों की जांच होना जरूरी है। यदि किसी अधिकारी या कर्मचारी द्वारा ठेकेदार से अवैध कमीशन लेने की बात सामने आती है तो यह केवल भ्रष्टाचार का मामला नहीं बल्कि जनता के पैसे के दुरुपयोग का विषय भी बन जाता है।

वहीं यदि आरोप गलत हैं तो संबंधित अधिकारी और नगर निगम प्रशासन को सामने आकर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए और यह बताना चाहिए कि निर्माण कार्यों की गुणवत्ता जांचने के लिए उनकी विभागीय व्यवस्था क्या है।

ठेकेदार बचाता है पैसा, जनता भुगतती है नुकसान?

निर्माण कार्य में ठेकेदार द्वारा घटिया सामग्री का इस्तेमाल कर लागत बचाने की कोशिश की जाती है तो उसका सीधा नुकसान जनता को होता है। सड़क टूटती है, नाली टूटती है, जलभराव होता है और कुछ समय बाद उसी काम की मरम्मत के लिए फिर सरकारी पैसा खर्च होता है।

यानी नुकसान दोहरा—पहले घटिया निर्माण पर भुगतान और बाद में उसी निर्माण की मरम्मत पर दोबारा सरकारी धन।

माजन खुर्द की नाली यदि जांच में मानक से कम गुणवत्ता की पाई जाती है तो नगर निगम को केवल ठेकेदार पर कार्रवाई तक सीमित नहीं रहना चाहिए। निर्माण की तकनीकी जांच, भुगतान प्रक्रिया, माप पुस्तिका, गुणवत्ता परीक्षण और संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए।

जनता के पैसे का हिसाब कौन देगा?

नगर निगम में विकास कार्य जनता के टैक्स और सरकारी बजट से होते हैं। जनता को यह जानने का पूरा अधिकार है कि उसके पैसे से बना निर्माण कुछ दिनों में क्यों टूट रहा है।

अब देखने वाली बात यह होगी कि नगर निगम प्रशासन माजन खुर्द की नाली के मामले में मौके पर जांच कराता है या फिर यह मामला भी शिकायतों और फोटो तक सीमित रह जाएगा।

मांग साफ है—माजन खुर्द स्कूल वाली गली में हुए नाली निर्माण की स्वतंत्र तकनीकी जांच हो, निर्माण सामग्री और गुणवत्ता की जांच कराई जाए, संबंधित ठेकेदार के भुगतान की जांच हो और यदि किसी स्तर पर लापरवाही या अनियमितता सामने आती है तो जिम्मेदारी तय कर कार्रवाई की जाए।

क्योंकि सवाल सिर्फ एक नाली का नहीं है—सवाल उस व्यवस्था का है जिसमें जनता के पैसे से बनने वाला निर्माण जनता के सामने ही टूटने लगे तो जवाबदेही आखिर किसकी होगी?

 

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