PRO की ‘फिल्टर पत्रकारिता’— क्या NTPC विंध्यनगर में सच्चाई तक पहुँचने से रोकने की कोशिश? सवालों से डर या सच्चाई से परहेज, NTPC पर ‘चयनित पत्रकार सम्मेलन’ का आरोप?

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By: नई ताक़त ।। डिजिटल टीम

On: Monday, March 30, 2026 7:48 AM

PRO की ‘फिल्टर पत्रकारिता’— क्या NTPC विंध्यनगर में सच्चाई तक पहुँचने से रोकने की कोशिश? सवालों से डर या सच्चाई से परहेज, NTPC पर ‘चयनित पत्रकार सम्मेलन’ का आरोप?

अवनीश तिवारी, नई ताकत ब्यूरो सिंगरौली
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SINGRAULI NEWS:   सिंगरौली के विंध्यनगर में हाल (The Situation in Vindhyanagar) ही में हुई NTPC की प्रेस कॉन्फ्रेंस (Press Conference) अब गंभीर बहस का विषय (A Subject of Serious Debate) बन गई है। इस बार सवाल सिर्फ इवेंट को लेकर नहीं हैं, बल्कि उस प्रोसेस को लेकर हैं जिसके तहत पत्रकारों (Journalists) को चुना गया। और इन सवालों के केंद्र में हैं—NTPC के पब्लिक रिलेशन ऑफिसर (PRO) शंकर सुब्रमण्यम।

 

 

 

 

किसी भी बड़े संस्थान में पीआरओ की भूमिका सिर्फ जानकारी (The Role of a PRO: Information Only) देने तक सीमित नहीं होती, बल्कि वह संस्थान (Institute) और समाज के बीच एक पुल का काम करता है। लेकिन जब यही पुल “फिल्टर” की तरह काम करने लगते हैं, तो समस्या शुरू (Problem Begins) होती है। यह साफ नहीं है कि विंध्यनगर में हुई इस प्रेस कॉन्फ्रेंस (Press Conference) में सीमित संख्या में पत्रकारों को बुलाने के पीछे क्या आधार था।

 

 

 

आरोप हैं कि सिलेक्शन प्रोसेस निष्पक्ष नहीं था और इसमें उन पत्रकारों को तरजीह दी गई जो संस्थान के लिए “सुविधाजनक” माने जाते हैं। अगर ऐसा है, तो इसे सिर्फ़ एडमिनिस्ट्रेटिव चूक (Administrative lapse) नहीं, बल्कि बातचीत को कंट्रोल (Control) करने की कोशिश माना जाएगा।

 

 

 

 

सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या PRO का रोल अब सिर्फ़ “इमेज मैनेजमेंट” तक ही सीमित रह गया है? अगर ज़मीनी मुद्दे उठाने वाले पत्रकार—जैसे राख का प्रदूषण (Ash Pollution) , पानी के सोर्स पर असर, और लोकल लोगों की परेशानियां—को मंच से दूर रखा जा रहा है, तो यह सीधे-सीधे सच को सीमित करने जैसा है।

 

 

 

 

ऐसे में NTPC के टॉप मैनेजमेंट (Top Management) के लिए यह देखना भी ज़रूरी हो जाता है कि कहीं उन्हें असली हालात से दूर तो नहीं रखा जा रहा। अगर PRO लेवल पर ही जानकारी को फ़िल्टर करके ऊपर भेजा जा रहा है और कम्युनिकेशन को कंट्रोल (Controlling Communication) किया जा रहा है, तो इससे न सिर्फ़ इंस्टीट्यूशन की इमेज (The Institution’s Image) पर असर पड़ता है, बल्कि फ़ैसले लेने के प्रोसेस पर भी असर पड़ता है।
पत्रकारिता (journalism) का असली मकसद सवाल उठाना है, और उन सवालों का जवाब देना एक ज़िम्मेदार इंस्टीट्यूशन का फ़र्ज़ (The Duty of the Institution) है। लेकिन अगर सवाल पूछने वालों को ही बाहर कर दिया जाए, तो यह बातचीत नहीं, बल्कि एकतरफ़ा प्रेजेंटेशन (One-sided Presentation) बनकर रह जाता है।

 

 

 

 

आज ज़रूरत इस बात की है कि NTPC अपने कम्युनिकेशन सिस्टम (communication system) का रिव्यू करे। PRO की भूमिका को ट्रांसपेरेंसी (Transparency in the Role) और निष्पक्षता के दायरे (The Scope of Impartiality) में लाया जाना चाहिए, ताकि हर पत्रकार को बराबर मौका मिले और हर सवाल सामने आ सके।
क्योंकि आखिरकार, किसी भी संस्था की क्रेडिबिलिटी (The Organization’s Credibility) उसके बयानों से नहीं, बल्कि उसके सवालों से तय होती है।

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