आवास योजना विवाद में बड़ा सवाल: कथित ऑडियो के बाद भी रण बहादुर सिंह पर कार्रवाई क्यों नहीं? शिकायतकर्ताओं पर कार्रवाई से कमिश्नर की भूमिका पर उठे सवाल
नई ताकत न्यूज नेटवर्क
सिंगरौली। नगर निगम सिंगरौली की आवास योजना से जुड़ा विवाद अब महज शिकायत और आरोपों तक सीमित नहीं रहा। कथित फर्जी दस्तावेज, रसीद, सील और हस्ताक्षरों से लेकर लाखों रुपये के कथित लेन-देन और रण बहादुर सिंह तथा अरुण गुप्ता के बीच बताए जा रहे कथित ऑडियो तक मामला गंभीर सवालों के घेरे में पहुंच गया है।
सबसे बड़ा सवाल अब नगर निगम प्रशासन की कार्यप्रणाली पर है—जब मामले में गंभीर आरोप लगाए जा रहे हैं और कथित ऑडियो भी सामने आया है, तो रण बहादुर सिंह पर अब तक कोई स्पष्ट कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
क्या रण बहादुर सिंह को मिल रहा है संरक्षण?
शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि उन्होंने आवास योजना से संबंधित दस्तावेज और रसीदें तत्कालीन सहायक राजस्व अधिकारी रण बहादुर सिंह के सामने रखीं तो कथित तौर पर उन्हें बताया गया कि उनके दस्तावेज और रसीदें फर्जी हैं।
शिकायतकर्ताओं का सीधा सवाल है—अगर दस्तावेज फर्जी थे तो वे बने कैसे? नगर निगम से जुड़े दस्तावेज, रसीद और कथित सील आवेदकों तक पहुंची कैसे?
शिकायतकर्ताओं का दावा है कि ये दस्तावेज उन्हें अरुण गुप्ता के माध्यम से मिले थे। उन्होंने अरुण गुप्ता पर बिचौलिये की भूमिका निभाने का आरोप लगाया है।
कथित ऑडियो ने बढ़ाया विवाद
मामले में तब और सनसनी बढ़ गई जब शिकायतकर्ताओं की ओर से रण बहादुर सिंह और अरुण गुप्ता के बीच बातचीत का एक कथित ऑडियो सामने आने का दावा किया गया।
शिकायतकर्ताओं का कहना है कि एक तरफ रण बहादुर सिंह द्वारा अरुण गुप्ता को नहीं जानने की बात कही गई, वहीं दूसरी तरफ सामने आए कथित ऑडियो में दोनों के बीच बातचीत होने का दावा किया जा रहा है।
अब सवाल है—
अगर दोनों के बीच कोई संबंध नहीं था तो कथित बातचीत किस संदर्भ में हुई?
और अगर बातचीत हुई थी तो आवास योजना से जुड़े मामलों पर उसमें क्या चर्चा हुई?
इन सवालों का जवाब केवल निष्पक्ष फोरेंसिक जांच से ही सामने आ सकता है।
लाखों के कथित लेन-देन का आरोप
मामले को और गंभीर बनाते हुए शिकायतकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि कथित फर्जी दस्तावेज तैयार कराने के नाम पर लाखों रुपये का लेन-देन किया गया।
यदि यह आरोप जांच में सही पाया जाता है तो मामला केवल फर्जी दस्तावेजों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सरकारी आवास योजना में कथित भ्रष्टाचार, धोखाधड़ी और आर्थिक लेन-देन की जांच का विषय बन जाएगा।
लेकिन सवाल यह है कि अब तक जांच की दिशा क्या है?
रण बहादुर पर कार्रवाई नहीं, शिकायतकर्ताओं के खिलाफ आवेदन क्यों?
सबसे बड़ा विवाद इसी बिंदु पर है।
शिकायतकर्ताओं का दावा है कि कथित ऑडियो और दस्तावेजों को लेकर सवाल उठाने के बावजूद रण बहादुर सिंह के खिलाफ कोई स्पष्ट कार्रवाई नहीं हुई। वहीं दूसरी तरफ शिकायतकर्ताओं के खिलाफ थाने में आवेदन दिए जाने की बात सामने आई है।
यही स्थिति अब नगर निगम कमिश्नर की भूमिका पर सवाल खड़े कर रही है।
क्या प्रशासन पहले शिकायतकर्ताओं को सुनेगा या पहले उन्हीं पर कार्रवाई करेगा?
क्या कथित ऑडियो की फोरेंसिक जांच कराई गई?
क्या दस्तावेजों की सील और हस्ताक्षरों की जांच हुई?
क्या रसीदों का नगर निगम के रिकॉर्ड से मिलान कराया गया?
क्या कथित लाखों रुपये के लेन-देन की जांच हुई?
और सबसे बड़ा सवाल—
अगर आरोप निराधार हैं तो जांच से डर कैसा?
किसी भी वायरल ऑडियो को बिना जांच के सच नहीं माना जा सकता। लेकिन जब किसी सरकारी योजना में गंभीर आरोप सामने आए हों तो निष्पक्ष जांच से ही सच्चाई सामने आ सकती है।
अगर ऑडियो फर्जी है तो फोरेंसिक जांच में सामने आ जाए।
अगर दस्तावेज फर्जी हैं तो उन्हें बनाने वालों पर कार्रवाई हो।
अगर पैसे का लेन-देन हुआ है तो उसकी जांच हो।
अगर शिकायतकर्ता गलत हैं तो उनके खिलाफ भी कानून के अनुसार कार्रवाई हो।
लेकिन कार्रवाई एकतरफा क्यों दिखाई दे रही है—यही सवाल पूरे मामले को और गंभीर बना रहा है।
नगर निगम प्रशासन की जिम्मेदारी है कि वह पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच कराए और जांच पूरी होने तक किसी भी पक्ष को संरक्षण मिलने की धारणा पैदा न होने दे।
अब जनता जानना चाहती है जवाब
आवास योजना गरीब और जरूरतमंद लोगों के लिए है। यदि इस योजना के नाम पर किसी ने दस्तावेज बनाए, पैसे लिए या लोगों को गुमराह किया है तो दोषी चाहे कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो, उसके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए।
नई ताकत न्यूज नेटवर्क का सीधा सवाल है—
कथित ऑडियो सामने आने के बाद भी रण बहादुर सिंह पर कार्रवाई क्यों नहीं?
शिकायतकर्ताओं के खिलाफ आवेदन देने की जरूरत क्यों पड़ी?
कथित दस्तावेजों और ऑडियो की फोरेंसिक जांच कब होगी?
लाखों रुपये के कथित लेन-देन की जांच कौन करेगा?
और सबसे महत्वपूर्ण—
आखिर नगर निगम प्रशासन रण बहादुर सिंह के मामले में इतना मौन क्यों है?
यदि सब कुछ साफ है तो जांच कराकर सच्चाई जनता के सामने रखी जाए। और यदि कहीं गड़बड़ी हुई है तो दोषियों पर कार्रवाई हो।
क्योंकि सवाल किसी एक व्यक्ति का नहीं—गरीबों के आवास और सरकारी व्यवस्था पर जनता के भरोसे का है।







