Breaking News: ट्रंप ने ईरान के शांति प्रस्ताव को ‘पागलपन’ बताया, तेहरान की शर्तों पर US प्रेसिडेंट गुस्से में, कहा कि न्यूक्लियर हथियारों से लैस सरकार बर्दाश्त नहीं की जाएगी
Breaking News: US प्रेसिडेंट (US President) डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के भेजे शांति प्रस्ताव पर मिले जवाब पर कड़ी नाराज़गी जताई (Expressed strong displeasure at the response.) है और इसे पूरी तरह से नामंज़ूर बताया (Declared unacceptable) है। ईरान ने पाकिस्तान के ज़रिए U.S. को सीज़फ़ायर का एक ड्राफ़्ट भेजा था, जिसमें पाबंदियां हटाने, पोर्ट्स की नाकाबंदी खत्म (Port Blockade Ends) करने और U.S. सेना की वापसी जैसी शर्तें रखी थीं। इन शर्तों पर रिएक्ट करते हुए, ट्रंप ने ‘ट्रुथ सोशल’ पर पोस्ट किया कि उन्हें ईरान के तथाकथित प्रतिनिधियों (They are being held accountable by the so-called representatives of Iran.) का जवाब बिल्कुल पसंद नहीं आया। उन्होंने ईरानी लीडरशिप (Iranian Leadership) को ‘पागलपन वाली सरकार’ कहा और साफ़ कर दिया कि ऐसी शर्तों पर कोई समझौता मुमकिन नहीं (No compromise is possible.) है।
हाल ही में एक इंटरव्यू (A recent interview) में, ट्रंप ने दावा किया कि ईरान मिलिट्री तौर पर पूरी तरह हार चुका (Completely defeated militarily) है और उसकी डिफेंसिव (Defensive) और अटैकिंग क्षमताएं लगभग खत्म हो चुकी (Attacking capabilities have all but vanished.) हैं। ट्रंप ने साफ़ तौर पर कहा कि तेहरान के पास अभी न तो एयर फ़ोर्स बची है और न ही कोई असरदार नेवी।
इलाके में चल रहे U.S. मिलिट्री ऑपरेशन पर बोलते (speaking on military operation) हुए, प्रेसिडेंट ने इशारा किया कि वॉशिंगटन का काम अभी खत्म (Washington’s work is now finished.) नहीं हुआ है। उन्होंने अंदाज़ा लगाया कि U.S. मिलिट्री ने अब तक अपने तय टारगेट (Your set targets) में से सिर्फ़ 70 परसेंट को ही तबाह किया है, जिसका मतलब है कि और भी हमले हो सकते हैं। ट्रंप ने दोहराया कि इंटरनेशनल कम्युनिटी (Trump reiterated that the international community) किसी भी कीमत पर ईरान को न्यूक्लियर हथियार बनाने की इजाज़त नहीं (Iran is not permitted to develop nuclear weapons—at any cost.) दे सकती। अभी, गल्फ़ इलाके में टेंशन सबसे ज़्यादा (Tension is highest in the Gulf region) है और डिप्लोमैटिक तरीकों के बजाय मिलिट्री बयानबाज़ी ने शांति की उम्मीदों (Military rhetoric, rather than diplomatic approaches, has dampened hopes for peace.) को और कम कर दिया है।







